Chhindwara District - Court Pictures
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Chhindwara

स्थापना जिला न्यायालय छिन्दवाड़ा एवं उसके तहसील स्थित न्यायालयों का इतिहास

’’छीन्द’’ (खजूर जैसा दिखने वाला एक मीठा फल) के पेड़ों की बाहुल्यता के कारण छीन्द नाम का एक छोटा-सा गांव था, जहां अयोध्या-फैजाबाद (उत्तरप्रदेश) से आये हाथी व्यापारी रतन रघुवंशी के द्वारा छीन्द का बाड़ा बनाकर बड़ा भवन बसाया गया था, तभी से यह स्थान ग्राम छिन्दवाड़ा के नाम से पहचाना जाने लगा था। तत्पश्चात् रतन रघुवंशी के अन्य परिजन यहां आकर निवास करते रहे और छिन्दवाड़ा एक छोटी बाजार के रूप में पहचान बनाने लगा, तब प्रथम बार इस जिले की सीमा का निर्धारण ’’ब्रिटिश शासन काल’’ में 1861 मंे किया गया, उस समय बालाघाट, सिवनी, बैतूल जिले भी इस छिन्दवाड़ा जिले में शामिल थे।
सन् 1854 में इस अंचल के आगमन पश्चात् अंगे्रजी शासन के समय से ही पुलिस व्यवस्था का कार्य प्रारंभ हो चुका था; तथापि वर्ष 1905 में नियमित पुलिस विभाग की पृथक रूप से स्थापना हुई थी। इसके पूर्व इस क्षेत्र विशेष में वर्ष 1902 में आबकारी विधान के प्रावधानों के साथ आबकारी विभाग अस्तित्व में आ चुका था; तथापि वर्ष 1901 में कारागार की आवश्यकता के कारण उसी वर्ष कारागार का निर्माण कर लिया गया था।
छिन्दवाड़ा में कचेहरी का निर्माण सर्वप्रथम सन् 1865 मंें किया गया था और उस समय इसमें तहसील कार्यालय भी सम्मिलित था। छिन्दवाड़ा की तहसील सौंसर और पांढुर्णा में नगरपालिका भी वर्ष 1867 को प्रारंभ हो चुकी थी।
ब्रिटिश समय में सिविल कोर्ट का पहला भवन छिन्दवाड़ा में मौजूद वर्तमान कलेक्ट्रेट आॅफिस के पश्चिम दिशा में खुली जगह पर दो मंजिला बिना मुंडेर वाली डिब्बे समान था, जिसमें न्यायालय संचालित होते थे। उस भवन को छिन्दवाड़ावासी ‘‘मुंडी कचहरी’’ के नाम से जानते थे। उल्लेखनीय है कि छिन्दवाड़ा न्यायालय में न्यायालयीन कार्य सन् 1873 के पूर्व से होता आ रहा था। वर्ष 1904 में न्याय-विभाग जब कार्यपालिका से पृथक हुआ था तो इन्हें सर्किल कोर्ट कहा जाता था, उस समय सत्र न्यायाधीश मात्र होशंगाबाद में पदस्थ थे। छिन्दवाड़ा के सर्वप्रथम सत्र न्यायाधीश श्री के0सी0वाड नियुक्त हुए थे। सन् 1916 में न्यायालय हेतु नये भवन का निर्माण किया गया, जो कि वर्तमान में जिला न्यायालय छिन्दवाड़ा का प्राचीनतम भवन होने के कारण हेरिटेज बिल्डिंग (भवन) घोषित कर दिया गया हैं।