District Court Durg (C.G.)
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District Court Durg (C.G.)
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MEDIATION

Durg Mediation Centre

Durg Mediation Centre is an initiative of the High Court of Chhattisgarh. It has been conceived as a project for giving effect to Section 89 of the Code of Civil Procedure which provides for Mediation as an Alternative Dispute Resolution mechanism. The project is implemented with the support of the Advocates Bar Association, Durg . It facilitates court-annexed mediation by trained Judicial Officers and advocate-mediators.

Chhattisgarh Mediation Rules 2015 Mediation Notification Mediation Guidelines Mediation Forms

Durg Mediation Centre 

.Trained Mediator Judicial Officer

Shri Rajesh Shrivastava,

District and Sessions Judge

Durg (C.G.)

 

SHRI BHANU PRATAP SINGH TYAGI

VIII ADDITIONAL DISTRICT AND SESSIONS JUDGE
DURG

SHRI VIVEK KUMAR VERMA

IV ADDITIONAL DISTRICT & SESSIONS JUDGE
DURG

SMT. SHRADDHA SHUKLA SHARMA

III ADDITIONAL PRINCIPAL JUDGE, FAMILY COURT
DURG

SHRI ALOK KUMAR 

I ADDITIONAL PRINCIPAL JUDGE, FAMILY COURT
DURG

 

Name of trained mediator Lawers

Name State Bar Regd. Number
Shri Sanjay Agrawal CG-0288-1987
Smt. Ramkali Yadav CG-0839-1992
Shri Shivshankar Singh CG-1877-1992
Shri Prakash Swarnkar CG-0053-1984
Shri Ashwini Singh CG-0532-1993
Shri Ashok Jaiswal CG-0607-2009

 

10 Raasons to Keep Out of Court

  1. Focus is on resolution, not battle
  2. Create win-win agreements
  3. Avoid unpredictable outcomes
  4. Costs far less than litigation
  5. Go at your own pace
  6. Improve communication
  7. Preserve ralationships
  8. Maintain your privacy
  9. Tell your story and be heard
  10. Less stress - No judges or juries

 


मध्यस्थता क्या है?

शांति बनाते हुये, शांति का निर्माण करना,
तनाव कम करना, आपसी संवाद बढाना,
आपसी समझ बढाना,
सूचनाओं का आदान प्रदान करना तथा समाधान का हल निकालना ।  
यह एक प्रक्रिया है ।

 

शुरु में लोग यह मानने से इंकार कर देते हैं, कि कोई नई चीज की जा सकती है,
जब वे यह आशा करना स्वीकार करते हैं कि कुछ किया जा सकता है तब वे देखते हैं
हां यह किया जा सकता है,
तब वह हो जाता है जिसका इन्तजार था,
तब दुनिया यह कहती है कि यह तो कई वर्षों पूर्व ही कर लिया जाना था,
इसे पहले क्यों नहीं किया गया ।

यह होती है मध्यस्थता ।

वकीलों के लिए मार्गदर्शन

मेरे लिये आनन्द की कोई सीमा नहीं थी, मैने कानून की प्रेक्टिस का सही अर्थ जाना है।
मैने मनुष्य के स्वाभाव के अच्छे पहलू का अध्ययन किया तथा उसके दिल में उतरने का अध्ययन किया।
मैने यह जाना कि वकील का सच्चा कर्तव्य निर्वहन, थके हुए और परेशान पक्षकारों को आपस में जोड़ने में है, लड़ाने में नहीं।
यह सीख मेरे जीवन में इतनी अक्षय एवं अमिट नहीं कि मेरे लम्बे जीवन को 20 वर्ष की वकालत की प्रैक्टीस में वकील के रुप में मैने
सैकड़ो मामले आपसी निजी समझौते के रूप में कराया,तथा इसमें मैने कुछ नहीं नहीं खोया, न ही धन, न ही अपनी आत्मा।

- मोहनदास करमचंद गांधी