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District Court Panna
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Panna

मध्यकालीन भारत में विदेशी आतताईयों से सतत् संघर्ष करने वालों में बुन्देल केशरी महाराजा छत्रसाल का नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय है। उन्होंने अपने पूरे जीवनभर स्वतंत्रता एवं सृजन के लिए सतत संघर्ष करते हुए शून्य से अपनी यात्रा प्रारंभ कर आकाश की उंचाई तक स्पर्श किया है। पन्ना महाराजा छत्रसाल द्वारा बसाया गया नगर है। उन्होंने पन्ना नगर को अपनी राजधानी बनाया था। महाराजा छत्रसाल के राज्य में हिन्दु, मुस्लिम एवं अछूतों को भी सम्माननीय स्थान प्राप्त था। गांव में परगने थे, जिसमें जातीय सभाएं होती थीं। इन जातीय सभाओं में अपराधियों को दण्ड देने का पूर्ण अधिकार था। ग्रामीणों में ग्राम पंचायतों की स्थापना की गई थी। प्रजा की सहूलियत के लिए हर ग्रामसभा चबूतरे पर निर्मित की जाती थी, जिसे छत्रसाली चबूतरा कहा जाता था, जहां छत्रसाल का झण्डा रहता था। छत्रसाल चबूतरा पर मारूतिनंदन की मूर्ति स्थापित की जाती थी, जिसे न्याय का चबूतरा कहा जाता था। इसी चबूतरे और झण्डे के नीचे पंचगण पंचायत करते थे। वादी, प्रतिवादी दोनों ही पक्षों को एक निश्चित तिथि में उपस्थित रहने के लिए सूचित किया जाता था। दोनों पक्ष शपथ लेते थे कि (हम छत्रसाली में खड़े हैं, अतः अपने इष्ट ईमान से सही कथन करेंगे)। इसके पश्चात पंचगण मामले की सुनवाई कर अपना निर्णय देते थे। यदि किसी को पंचायत का निर्णय मान्य नहीं हुआ तो वे उच्च न्यायालय में अपनी विनती करते थे। उच्च न्यायालय में संत, महात्मा, पंडित, फकीर, मौलाना आदि विद्वानजन इस न्यायालय के न्यायाधीश होते थे। महाराजा छत्रसाल राज्य का प्रशासन मऊ-महेबा से करते थे, परन्तु कुछ विभागों का मुख्यालय छतरपुर में था। यदि उच्च न्यायालय के निर्णय से भी कोई पक्ष असंतुष्ट रहता था, तब उसे अंतिम विनती महाराजा छत्रसाल के पास करने का अधिकार था एवं महाराजा छत्रसाल ऐसे मामले में स्वयं विवादित स्थल पर पहुंच कर मामले की छानबीन कर अंतिम निर्णय लेते थे।
महाराजा छत्रसाल के शासनकाल में प्रत्येक बड़ी ग्रामसभा में पंचायत एवं ग्राम पंचायतों के उपर परगना या तहसील पंचायत एवं तहसील पंचायतों के उपर केन्द्र पंचायत स्थापित की गई थी। यदि कोई विवाद ग्राम पंचायत से निराकृत नहीं होता था, तब वह तहसील की पंचायत से निबटाया जाता था एवं तहसील पंचायत की अपील केन्द्र पंचायत में होती थी। एक धर्मसभा भी स्थापित थी, जहां पर केन्द्र के फैसलों की जांच होती थी। महाराजा छत्रसाल स्वयं भी मौके पर बड़े फैसले करते थे। इन पंचायतों में प्रति जाति के दो-दो पंच रहते थे। प्रति पंचायत में 08 पंच रहते थे।
पन्ना राज्य में कुल 44 परगने थे एवं 11,665 गांव थे। गांव की पंचायतों के उपर पंचकोषीय पंचायत होती थी एवं इनके उपर तहसील की पंचायत थी। तहसील पंचायत के उपर एक बड़ी पंचायत केन्द्र पंचायत थी, जिसे छतरपुरी पंचायत कहा जाता था। राज दरबार में मंत्री मण्डल रहता था। मंत्री मण्डल में प्रत्येक जाति के दो प्रतिष्ठित पुरूष सम्मिलित थे। प्रशासकीय कर्मचारियों में किताबी-सरकारी कागजातों को संभाल कर रखने वाला, बुताईती-राजकीय व्यय का हिसाब रखने एवं महलों में आवश्यक वस्तुओं को पहुंचाने वाला, बख्शी-राज्य के आय-व्यय का ब्यौरा तथा विभिन्न विभागों के आय-व्यय के ब्यौरे की जांच करने वाला, मुंशी-विभिन्न विभागों के दफ्तरों के लेखक को दफ्तरी या मंत्री कहा जाता था। खास कलम-राजा के व्यक्तिगत और गुप्त पत्र व्यवहार एवं राज्य के सभी महत्वपूर्ण मामलों की जानकारी रखने वाला व्यक्ति खास कलम होता था, जिसके पास राज्य की मोहर होती थी।
महाराजा छत्रसाल के पत्रों में सिरनामों पर यह चेतावनी लेख थी कि ‘‘ जान है सो मान है, न मान है सो जान है ’’ उक्त पदों पर नियुक्ति स्वयं महाराजा छत्रसाल के द्वारा जांच उपरांत की जाती थी। राज्य में डाक चौकी और हरकारों की व्यवस्था थी। पन्ना रियासत के न्यायिक इतिहास में एक उल्लेखनीय घटना का जिक्र सुनने में आता है, जिसके अनुसार महाराजा छत्रसाल अपने राज्य में सभी मंत्रियों के साथ शासन व्यवस्था पर विचार-विमर्श कर रहे थे, उस समय राज्य के जन कल्याणकारी मसले पर सभी मंत्री व महाराजा एकमत थे। जब मंत्री ने योजना पर महाराज की सहमति (हां) चाही, तब धोखे से महाराजा के द्वारा ‘‘ना ही’’ शब्द उच्चारित हो गया, जिसपर मंत्री के द्वारा महाराजा से कहा गया कि हुजूर की तो सहमति थी, किन्तु ‘‘ना ही’’ हो गई, जिसपर छत्रसाल ने कहा कि आज से पन्ना राज दरबार की मोहर (सील) ‘‘ना ही’’ होगी। तदोपरांत जबतक पन्ना रियासत की सरकार चली, पन्ना रियासत की मोहर ‘‘ना ही’’ उपयोग में लाई गई। ऐसा बताया जाता है कि पुराने जमीन के मालकाना हक व आधिपत्य संबअंधी विवादों में पन्ना रियासत की ‘‘ना ही’’ मोहर दर्शित होती है एवं पन्ना रियासत की न्यायिक व्यवस्था में ‘‘ना ही’’ का मतलब ‘‘हां’’ के रूप में माना जाता था।
पन्ना रियासत के शासकों की शासन व्यवस्था यद्यपि प्राकृतिक न्याय पर आधारित थी, किन्तु रियासत की न्याय व्यवस्था के अंतर्गत राजा के निर्णय के विरूद्ध कोई अपील, वकील या दलील नहीं होती थी। राजा का न्याय ही अंतिम सर्वोच्च निर्णय होता था। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्थ में महेन्द्र महाराजा रूद्र प्रताप सिंह जूदेव के शासन काल से ब्रिटिश इण्डिया न्यायालयों में हो कानून व्यवस्था लागू थी, वही व्यवस्था पन्ना रियासत में लागू थी। वर्ष 1948-49 में देशी रियासत के विलीनीकरण उपरांत पन्ना बुन्देलखण्ड व रीवा बघेलखण्ड की सभी छोटी-बड़ी रियासतों को मिलाकर विंध्यप्रदेश बना, तब पन्ना जिले की न्यायिक व्यवस्था तत्कालीन रीवा राज्य में प्रचलित कानून लागू किए गए। उक्त न्याय व्यवस्था 31 अक्टूबर 1056 तक मध्यप्रदेश की स्थापना तक चलती रही। 01 नवंबर, 1956 को मध्य प्रदेश राज्य बनने पर कुछ वर्षों तक सिविल जिला छतरपुर से पन्ना जिले की न्यायिक व्यवस्था का संचालन होता रहा एवं पश्चात में पन्ना जिले की न्यायिक व्यवस्था सतना जिले से संचालित की गई है। 15 जुलाई 1978 को पन्ना जिला सिविल जिला घोषित किया गया एवं जिले के प्रथम जिला एवं सत्र न्यायाधीश के रूप में श्री जी.के.कुलश्रेष्ठ की पदस्थापना हुई।
महाराजा छत्रसाल के वंशज महाराजा माधव सिंह वर्ष 1897 से 1902 तक पन्ना के राजा रहे। इनके कार्यकाल में महेन्द्र भवन पन्ना का निर्माण हुआ, जिसमें दिनांक 11.03.2016 तक जिला न्यायालय पन्ना संचालित होता रहा, पश्चात में दिनांक 14.03.2016 को इंद्रपुरी पन्ना में नवीन जिला न्यायालय भवन में जिला न्यायालय स्थानांतरित होकर संचालित हो रहा है। नवीन न्यायालय भवन इन्द्रपुरी पन्ना रिट याचिका क्रमांक 4442/2002 अभिभाषक संघ पन्ना वि0 म.प्र.राज्य के प्रकरण में माननीय मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा दिनांक 17.03.2003 को पारित आदेश के पालन में निर्मित किया गया है।